उत्तराखंड के इस प्राचीन काली मंदिर का है अपना अलग महत्व
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पर्वतों के बीच कालापानी का प्राचीन काली मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि यहीं से काली नदी की शुरुआत होती है। लोगों की मान्यता है कि मंदिर के पास बहने वाली एक छोटी सी पवित्र धारा ही आगे चलकर काली नदी का रूप ले लेती है। यही काली नदी आगे जाकर भारत और नेपाल के बीच प्राकृतिक सीमा भी बनाती है। मंदिर परिसर में बहते इस जल को लोग देवी काली का आशीर्वाद मानते हैं और श्रद्धा के साथ इसे अपने साथ ले जाते हैं। कालापानी का यह काली मंदिर आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक अहम पड़ाव भी है। जो भी यात्री इस दुर्गम और दिव्य यात्रा पर निकलते हैं, वे यहां रुककर माता काली के दर्शन जरूर करते हैं और आगे की यात्रा के लिए आशीर्वाद लेते हैं। चारों तरफ फैली बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां, ठंडी हवाएं और शांत वातावरण इस जगह को और भी विशेष बना देते हैं। मंदिर के पास ही व्यास गुफा भी स्थित है।
मान्यता है कि महान ऋषि वेद व्यास ने इसी गुफा में बैठकर कठोर तपस्या की थी और यहीं से उन्होंने ज्ञान की अलौकिक रोशनी से मानवता को मार्ग दिखाया। इसी कारण यह स्थान सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि एक पवित्र तपोभूमि भी माना जाता है। मान्यता है कि यह जगह पांडवों की कथाओं से भी जुड़ी हुई है। माना जाता है कि अपने वनवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में कुछ समय बिताया था। आसपास के कई स्थानों के नाम जैसे भीम शिला और युधिष्ठिर मार्ग इन्हीं कथाओं से जुड़े बताए जाते हैं। इस क्षेत्र में रहने वाला भोटिया समुदाय काली माता को अपना रक्षक देवता मानता है। उनका विश्वास है कि माता काली इस पूरी घाटी की रक्षा करती हैं और सच्चे मन से आने वाले यात्रियों की यात्रा सुरक्षित बनाती हैं।हालांकि कालापानी तक पहुंचना आसान नहीं है। यात्रियों को धारचूला से कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरना पड़ता है।

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