तेहरान ने रखी शर्त: बातचीत से पहले ये मांग पूरी करे अमेरिका
ईरान और अमेरिका के बीच कूटनीतिक हलचल: मध्यस्थ की भूमिका में पाकिस्तान सक्रिय
तेहरान/इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के मध्य रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। वर्तमान में दोनों देशों के बीच सीधे संवाद के रास्ते बंद हैं, लेकिन बैक-चैनल कूटनीति के जरिए संपर्क साधने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरकर सामने आया है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता और कूटनीतिक प्रयास
हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस्लामाबाद का दौरा किया, जहाँ उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व (जनरल असीम मुनीर) के साथ उच्च स्तरीय वार्ता की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय शांति और दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच संवाद के लिए एक साझा मंच तैयार करना था। पाकिस्तान इस समय वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक सेतु (Bridge) की भूमिका निभाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।
सीधे संवाद की राह में प्रमुख चुनौतियाँ
ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी सीधी मेज पर बैठने के लिए कड़ी शर्तें रखी हैं:
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प्रतिबंधों का मुद्दा: ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका अपनी आर्थिक और सामरिक नाकाबंदी खत्म नहीं करता, तब तक सीधी बातचीत संभव नहीं है।
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अप्रत्यक्ष संवाद: ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में कोई भी सीधी बैठक प्रस्तावित नहीं है। तेहरान अपने संदेशों और चिंताओं को पाकिस्तानी दूतों के माध्यम से अमेरिका तक पहुँचाने के विकल्प पर काम कर रहा है।
तनाव के प्रमुख कारण
पिछले कुछ महीनों में दोनों शक्तियों के बीच संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
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सैन्य तैनाती: अमेरिका द्वारा क्षेत्र में नौसैनिक बेड़े भेजे जाने से स्थिति संवेदनशील हो गई है।
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समुद्री मार्ग का अवरोध: जवाबी कार्रवाई में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की चेतावनी और जहाजों की जब्ती ने संघर्ष की आशंका बढ़ा दी है।
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बंदरगाहों की नाकाबंदी: दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के व्यापारिक हितों को चोट पहुँचाने की कोशिशों से अविश्वास और गहरा गया है।
अन्य वैश्विक मध्यस्थ
पाकिस्तान के अलावा ओमान और रूस भी इस कूटनीतिक गतिरोध को कम करने में जुटे हैं। विशेष रूप से ओमान का इतिहास ईरान और अमेरिका के बीच जिनेवा जैसे मंचों पर सफल अप्रत्यक्ष वार्ता कराने का रहा है।
ईरान की आंतरिक राजनीति का असर
ईरान के भीतर चल रही वैचारिक खींचतान भी वार्ता की राह में एक बड़ा रोड़ा है। वहाँ के उदारवादी और कट्टरपंथी धड़ों के बीच कूटनीति को लेकर अलग-अलग राय है। दूसरी ओर, अमेरिकी नेतृत्व ईरान की इस आंतरिक स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है और फिलहाल संघर्ष विराम जैसी स्थितियों को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाकर कूटनीति को एक मौका देना चाहता है।

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