ताजा सर्वें में आया सामने..........ट्रंप नहीं खत्म कर सकते भारत में डेयरी कारोबार
नई दिल्ली। यह बात सभी को पता है कि अमेरिका और भारत की ट्रेड डील सिर्फ इसलिए अटकी हुई है, क्योंकि भारत ने अमेरिका का डेयरी और एग्रीकल्चर सेक्टर में अमेरिका का प्रवेश नहीं दिया है। अब एक रिपोर्ट में बताया गया हैं कि अमेरिका कभी भारत के डेयरी उद्योग को खत्म ही नहीं कर सकता। इसका कारण देश में आज भी 38 फीसदी पशुपालक दूध बेचने के लिए जानवर नहीं पालते, बल्कि खेती और खुद के उपयोग के लिए पशुपालन करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, देश के एक तिहाई से ज्यादा पशुपालक दूध नहीं बेचते और इसके बजाय वे घरेलू पोषण, गोबर और खेती संबंधी अन्य कामकाज में पशुओं के इस्तेमाल पर जोर देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये नतीजे इस मान्यता को चुनौती देते हैं कि भारत का मवेशी क्षेत्र मुख्य रूप से दूध की बिक्री से चलता है। रिपोर्ट के लिए 15 राज्यों में 7,350 मवेशी पालने वाले परिवारों का सर्वेक्षण किया, जो देश की 91 फीसदी दुधारू आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अध्ययन में सामने आया कि करीब 38 फीसदी पशुपालक या करीब तीन करोड़ लोग, दूध की बिक्री को मवेशी रखने की प्रेरणा नहीं मानते हैं। झारखंड में यह हिस्सा 71 फीसदी और पश्चिम बंगाल व हिमाचल प्रदेश में 50 फीसदी से ज्यादा है। पशुपालकों का एक बड़ा हिस्सा पशुपालन जारी रखने की इच्छा रखता है।
अध्ययन में सामने आया कि करीब तीन-चौथाई पशुपालकों को इलाके में ज्यादा दूध होने के बावजूद सस्ता चारा और आहार जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 7 फीसदी पशुपालक यानी देशभर में करीब 56 लाख पशुपालक मवेशियों को दूध के अलावा दूसरे कामों के लिए रखते हैं। इसमें गोबर, बैलगाड़ी खींचने या जानवरों को बेचने से होने वाली कमाई जैसे कार्य शामिल हैं। बंगाल और महाराष्ट्र में यह करीब 15 फीसदी है। हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और असम में 15 फीसदी से ज्यादा पशुपालक मवेशी रखने की अपनी मुख्य वजह सामाजिक-सांस्कृतिक या धार्मिक वजह बताते हैं।
सर्वें में सामने आया कि 34 फीसदी पशुपालकों ने घर में इस्तेमाल होने वाले दूध को सबसे पहले रखा, जबकि 20 फीसदी ने दूध से अलग वजहों को अपनी मुख्य चिंता बताया। बाजार के अलावा दूसरे इस्तेमाल के लिए मवेशी रखने वाले ज्यादातर घरों में आम तौर पर एक या दो देशी जानवर होते हैं, जो खेती के कामकाज में उनकी अहम भूमिका को दिखाता है। पंजाब में 1,389 जानवरों के अस्पताल हैं, लेकिन सिर्फ 22 मोबाइल डिस्पेंसरी हैं, जबकि आंध्र प्रदेश में 337 अस्पताल और 1,558 मोबाइल डिस्पेंसरी हैं। लगभग 75 फीसदी मवेशीपालक गोबर को एक मुख्य प्रेरक मानते हैं। लिहाजा अध्ययन में गोबर से मूल्यवर्धन के लिए बेहतर मौकों पर जोर दिया गया, जिसमें घरेलू बायोगैस से लेकर वर्मीकम्पोस्टिंग और मूल्यवर्धित खाद तक शामिल हैं।

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