दिल्ली बिल्डिंग हादसे का नया CCTV आया सामने, देखते ही देखते ढह गई पूरी इमारत
नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को एक बहुमंजिला इमारत भरभराकर जमींदोज हो गई। पीजी (पेइंग गेस्ट) के तौर पर इस्तेमाल की जा रही इस इमारत के मलबे में दबने से अब तक छह लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि 11 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। घटना का एक दिल दहला देने वाला सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जिसमें मलबा गिरते ही नीचे मौजूद एक बुजुर्ग ठेला चालक भागकर बाल-बाल बचते नजर आ रहे हैं।
मलबे में फंसे लोगों को निकालने के लिए युद्धस्तर पर अभियान
हादसे के तुरंत बाद एनडीआरएफ, कैट्स एंबुलेंस और स्थानीय प्रशासनिक टीमों ने मौके पर मोर्चा संभाला। मलबे में कुछ अन्य लोगों और छात्रों के दबे होने की आशंका के चलते अत्याधुनिक कटिंग व सर्च उपकरणों की मदद से राहत और बचाव कार्य लगातार जारी है। पूरे इलाके में चीख-पुकार और अफरातफरी का माहौल बना हुआ है।
एमसीडी का एक्शन: जर्जर ढांचों को नोटिस, अवैध निर्माण होंगे सील
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के अनुसार, ढही इमारत सत्य निकेतन के पी-14 स्थित लगभग 55 वर्ग गज के प्लॉट पर 1990 के दशक में बनाई गई थी, जिसमें बेसमेंट, भूतल और चार मंजिलें शामिल थीं। हादसे के बाद निगम ने उस गली में मौजूद अन्य जर्जर भवनों को आनन-फानन में नोटिस थमाए हैं। दिल्ली के मेयर प्रवेश वाही ने कड़ा रुख अपनाते हुए घोषणा की है कि चार मंजिल से ऊपर बने सभी अवैध निर्माणों को तत्काल सील किया जाएगा और लापरवाही बरतने वाले दोषी अधिकारियों पर बर्खास्तगी की कार्रवाई होगी।
मजिस्ट्रियल जांच के आदेश, आसपास के पीजी खाली कराए गए
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस भीषण हादसे की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश देते हुए भवन स्वामी पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन ने एहतियात बरतते हुए आसपास के अन्य पीजी भवनों को तुरंत खाली करवा दिया है, जिसके चलते सैकड़ों छात्र-छात्राओं और कामकाजी युवाओं के सामने अचानक सिर छिपाने का संकट खड़ा हो गया है। कई संचालकों ने कार्रवाई से बचने के लिए अपने पीजी बोर्ड तक हटा दिए हैं।
सुरक्षा मानकों और नियमों पर फिर उठे गंभीर सवाल
यह हादसा राष्ट्रीय राजधानी में बिना अनुमति और सुरक्षा मानकों के चल रहे पीजी और हॉस्टलों की हकीकत को फिर उजागर करता है। राजेंद्र नगर बेसमेंट हादसे के बाद भी पीजी के लिए एकीकृत स्ट्रक्चरल और फायर सेफ्टी कोड लागू नहीं हो पाना प्रशासनिक ढिलाई की ओर इशारा करता है। क्षमता से अधिक छात्रों को ठहराने, आपातकालीन निकास के अभाव और कमजोर ढांचों की नियमित निगरानी न होने को लेकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।

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