जमीयत का ऐलान: वंदे मातरम पर सरकार का फैसला नहीं बदला तो कोर्ट की राह
नई दिल्ली। देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम गीत को अनिवार्य बनाने के सरकारी प्रयासों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने का मन बना लिया है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ तौर पर कहा है कि इस गीत को जबरन थोपना उनके मजहबी अकीदे और विश्वास के पूरी तरह खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकार की अनिवार्यता के जरिए देश के अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को छीनने की कोशिश की जा रही है। यह बात उन्होंने दिल्ली में आयोजित जमीयत की दो दिवसीय केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक के समापन सत्र के दौरान देश भर से आए प्रतिनिधियों के सामने कही। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में देश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनावों और जनगणना जैसे गंभीर मुद्दों पर भी गहराई से मंथन किया गया।
राष्ट्रगान के समकक्ष दर्जा देने के सरकारी फैसले का पुरजोर विरोध
इस विशेष अधिवेशन के दौरान केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा देने और इसके सभी छह अंतरा (बंद) को अनिवार्य रूप से लागू करने के नीतिगत निर्णय को सर्वसम्मति से पूरी तरह खारिज कर दिया गया। संगठन के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने सामूहिक रूप से इस निर्णय पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे भारतीय संविधान की मूल आत्मा, धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों और ऐतिहासिक फैसलों के विपरीत ठहराया है। जमीयत ने सरकार से इस कदम को तुरंत वापस लेने की पुरजोर मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि इस फैसले को वापस नहीं लिया गया, तो देश की लोकतांत्रिक न्याय प्रणाली के तहत न्यायालय के माध्यम से इसके खिलाफ एक बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। इसके साथ ही बैठक में कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा हाल ही में दिए गए उन राजनीतिक बयानों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई, जिनमें एक विशेष वर्ग के वोटों के आधार पर सरकार चलाने की बात कही गई थी।
धार्मिक स्थलों और मदरसों पर हो रही कार्रवाई को लेकर जताई गई चिंता
सत्र को संबोधित करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने देश के विभिन्न हिस्सों में मस्जिदों, प्राचीन मकबरों और पारंपरिक मदरसों को गैर-कानूनी बताकर ध्वस्त किए जाने की हालिया घटनाओं पर गहरा दुख और चिंता प्रकट की। उन्होंने इस संकट से उबरने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक दूरगामी रणनीति की घोषणा करते हुए बताया कि बहुत जल्द केंद्रीय और राज्य स्तर पर एक सुदृढ़ मदरसा बोर्ड का गठन किया जाएगा। इस बोर्ड के माध्यम से देश के सभी स्वतंत्र मदरसों को एक सूत्र में पिरोया जाएगा ताकि उनकी प्रशासनिक और कानूनी समस्याओं का सामूहिक तथा संगठित रूप से स्थायी समाधान निकाला जा सके।
दस्तावेजों को दुरुस्त रखने और एसआईआर को लेकर सतर्कता बरतने की अपील
अपने संबोधन के अंतिम चरण में जमीयत प्रमुख ने एसआईआर (स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ रिकॉर्ड्स/नागरिकता संदर्भों) के तकनीकी मामलों को लेकर मुस्लिम समुदाय को अत्यधिक जागरूक, समझदार और सतर्क रहने की विशेष सलाह दी। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि बदलते दौर में कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों से बचने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने और अपने परिवार के तमाम जरूरी और पहचान से जुड़े सरकारी दस्तावेजों को पहले से ही पूरी तरह तैयार और त्रुटिहीन रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय रहते की गई यह तैयारी भविष्य में आने वाली किसी भी प्रशासनिक या कानूनी असुविधा से बचाने में सबसे मददगार साबित होगी।

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