‘ऑपरेशन टाइगर’ क्या है? शिवसेना (UBT) में टूट के पीछे की पूरी कहानी
मुंबई। देश की सियासत में इन दिनों बगावतों और राजनीतिक उलटफेर का दौर चरम पर है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा खेमे में सुगबुगाहट, तमिलनाडु चुनाव के बाद एआईएडीएमके सांसदों के बागी तेवर और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में मची रार के बाद अब महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को चार साल के भीतर एक और बड़े बिखराव का सामना करना पड़ा है। पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसदों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पाला बदलने की पुष्टि कर दी है। राजनीतिक गलियारों में इस पूरे दलबदल अभियान को 'ऑपरेशन टाइगर' का नाम दिया गया है, जिसने मुंबई से लेकर दिल्ली तक सियासी तापमान बढ़ा दिया है। उद्धव गुट ने इसे भारतीय जनता पार्टी की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।
क्या है 'ऑपरेशन टाइगर' और इसकी पृष्ठभूमि
'ऑपरेशन टाइगर' दरअसल एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना द्वारा उद्धव ठाकरे गुट के जनप्रतिनिधियों को अपने पाले में लाने के लिए चलाए गए एक कथित अभियान का नाम है। इस नामकरण के पीछे मुख्य वजह यह है कि बाघ हमेशा से अविभाजित शिवसेना का पारंपरिक प्रतीक रहा है, जिसे दिवंगत बालासाहेब ठाकरे ने तैयार किया था। शिंदे गुट का मकसद उद्धव खेमे को कमजोर कर बालासाहेब की असली राजनीतिक विरासत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना है। इस अभियान की भनक अप्रैल महीने से ही मिलने लगी थी, जब शिंदे गुट के नेताओं ने दावा किया था कि कई सांसद उनके संपर्क में हैं। यह सुगबुगाहट तब सच साबित हुई जब उद्धव ठाकरे द्वारा मुंबई में बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठक और आदित्य ठाकरे के जन्मदिन समारोह से कई सांसद नदारद रहे और उनके फोन 'नॉट रीचेबल' हो गए। इसके बाद खबर आई कि छह सांसदों ने गुपचुप तरीके से दिल्ली का रुख कर लिया है, जिसके बाद दलबदल की यह पटकथा खुलकर सामने आ गई।
पार्टी का स्टैंड और दल-बदल विरोधी कानून
इस बड़ी टूट पर शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जो लोग पार्टी में सेंधमारी कर रहे हैं वे बाघ नहीं बल्कि भेड़िये हैं, और इसके जवाब में उनकी पार्टी 'ऑपरेशन वुल्फ' शुरू करेगी। राउत ने आरोप लगाया कि सांसदों को तोड़ने के लिए 50 करोड़ रुपये का प्रलोभन दिया जा रहा है। टूट को रोकने के लिए उद्धव गुट के मुख्य सचेतक अनिल देसाई ने व्हिप भी जारी किया था और अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर बागी गुट को मान्यता न देने का अनुरोध किया था। जहां तक कानूनी स्थिति का सवाल है, संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत सदन में अयोग्यता से बचने के लिए मूल दल के कम से कम दो-तिहाई विधायी सदस्यों का अलग होना जरूरी है। लोकसभा में उद्धव गुट के कुल नौ सांसदों में से छह का टूटना ठीक दो-तिहाई का आंकड़ा बैठता है, जिससे फिलहाल उनकी संसद सदस्यता पर तात्कालिक संकट टल सकता है। हालांकि, पूर्ण कानूनी संरक्षण के लिए विधानसभा के विधायकों का भी इसी अनुपात में टूटना आवश्यक माना जा रहा है।
एनडीए को सियासी फायदा और आगामी विधेयकों का गणित
इस देशव्यापी राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा फायदा केंद्र की सत्ताधारी एनडीए सरकार को मिलता दिख रहा है। वर्तमान में एनडीए के पास 293 सांसद हैं। यदि तृणमूल कांग्रेस के संभावित 19-20 बागी सांसद और शिवसेना के ये छह बागी सांसद एनडीए खेमे को समर्थन देते हैं, तो यह संख्या बढ़कर 320 तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस के बीच पैदा हुए मतभेदों के चलते यदि द्रमुक के 22 सांसद भी मुद्दों के आधार पर सरकार को समर्थन देते हैं, तो एनडीए का आंकड़ा 342 तक जा सकता है। हालांकि, लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत (सदन की वर्तमान संख्या के अनुसार लगभग 360 सांसद) की आवश्यकता होगी। ऐसे में इन तमाम बगावतों और नए समीकरणों के बाद भी एनडीए जादुई आंकड़े से थोड़ा दूर रह सकता है, जिसके लिए उसे अन्य क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहना होगा।

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