हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख: स्वतः नहीं मिलेगा बैक वेज, लागू होगा नो वर्क नो पे
बिलासपुर: सरकारी कर्मचारियों की सेवा और उनकी बर्खास्तगी की अवधि से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने एक बड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषी पाए जाने (कन्विक्शन) के आधार पर नौकरी से बर्खास्त किया गया था, और बाद में वह ऊपरी अदालत से बरी (Acquitted) हो जाता है, तो केवल बरी होने मात्र से ही उसे बर्खास्तगी के समय का पूरा बकाया वेतन (Back Wages) पाने का अपने आप कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने साफ कहा कि ऐसे मामलों में 'काम नहीं तो वेतन नहीं' (No Work, No Pay) का सिद्धांत पूरी तरह लागू होगा।
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा मामला राज्य के विद्युत मंडल (Electricity Board) के एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ा हुआ है:
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भ्रष्टाचार का आरोप और बर्खास्तगी: कर्मचारी सहायक श्रेणी-1 (सिविल) के पद पर तैनात था और बाद में उसे पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) बनाया गया था। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत केस दर्ज हुआ था। विशेष अदालत (स्पेशल कोर्ट) ने उसे दोषी करार दिया, जिसके बाद विभाग ने नियमों के तहत उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
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अपील और रिटायरमेंट: कर्मचारी ने अपनी सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान ही वह अपनी सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र भी पूरी कर चुका था।
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अदालत से बरी और विभाग का फैसला: बाद में हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। बरी होने के बाद विभाग ने उसका बर्खास्तगी का आदेश तो वापस ले लिया और उसे कागजों में (काल्पनिक रूप से) बहाल मान लिया, लेकिन बर्खास्तगी से लेकर रिटायरमेंट तक के बीच की अवधि का वास्तविक वेतन और एरियर देने से साफ मना कर दिया।
सिंगल बेंच से लेकर डिवीजन बेंच तक की कानूनी लड़ाई
विभाग द्वारा बकाया वेतन न दिए जाने के फैसले को कर्मचारी ने पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में चुनौती दी, जहां उसकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उसने पुनर्विचार याचिका लगाई, वह भी निरस्त हो गई। आखिरकार उसने डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के सामने अपील दायर की।
कर्मचारी का तर्क:
"जब अदालत ने मुझे सम्मानपूर्वक बरी कर दिया है और निचली अदालत का सजा का फैसला टिक ही नहीं पाया, तो मुझे सेवा से जबरन बाहर रखने की अवधि का पूरा वेतन और भत्ते मिलने चाहिए।"
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला और सुप्रीम कोर्ट की नजीर
डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कर्मचारी की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इन कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया:
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बर्खास्तगी के समय का आधार वैध था: जिस समय विभाग ने कर्मचारी को नौकरी से निकाला था, उस समय उसके खिलाफ कोर्ट का सजा का आदेश प्रभावी था। इसलिए बाद में अपील में बरी हो जाने से, पास्ट में की गई विभाग की वैध कार्रवाई अपने आप शून्य (Void) नहीं हो जाती।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) भी अपने कई फैसलों में यह तय कर चुकी है कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के कारण हटाए गए कर्मचारी बाद में बरी होने पर पिछले वेतन का दावा एक अधिकार के रूप में नहीं कर सकते।
अदालत का निष्कर्ष: चूंकि कर्मचारी ने उस विवादित अवधि के दौरान विभाग के लिए कोई वास्तविक कार्य नहीं किया था, इसलिए वह उस समय के वेतन का हकदार नहीं है। इस फैसले के बाद अब विभाग की कार्रवाई को कानूनी रूप से सही ठहराया गया है।

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