कांग्रेस नेताओं की एंट्री पर पन्ना टाइगर रिजर्व में FIR दर्ज
पन्ना: केन-बेतवा लिंक परियोजना और आदिवासियों के विस्थापन को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच, पन्ना टाइगर रिजर्व के प्रतिबंधित क्षेत्र में कांग्रेस नेताओं की उपस्थिति ने एक नया कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।
टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में प्रवेश पर कानूनी शिकंजा
पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने नियमों के उल्लंघन को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और युवा कांग्रेस नेता अभिषेक परमार सहित करीब 20 कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया है। वन विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि यह क्षेत्र वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है और यहां बिना पूर्व अनुमति के प्रवेश करना पूरी तरह वर्जित है। इसी आधार पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत यह कार्रवाई की गई है, जिससे प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
साक्ष्यों का संकलन और प्रशासन की सख्त घेराबंदी
इस संवेदनशील मामले की जांच को आगे बढ़ाते हुए प्रशासन अब घटनास्थल से जुड़े वीडियो फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्य एकत्र करने में जुटा है ताकि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि कानून सबके लिए बराबर है और संरक्षित वन क्षेत्र की मर्यादा का उल्लंघन किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। वन विभाग की इस सक्रियता को कांग्रेस नेताओं की घेराबंदी के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे आने वाले दिनों में जांच का दायरा और बढ़ने की संभावना है।

कांग्रेस ने कार्रवाई को बताया सरकार का राजनीतिक प्रतिशोध
दूसरी ओर, कांग्रेस ने वन विभाग की इस कार्रवाई को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित और दबाव की रणनीति करार दिया है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि उनके नेता केवल केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित होने वाले ग्रामीणों और विस्थापितों की पीड़ा सुनने के लिए वहां गए थे और उनका उद्देश्य किसी भी तरह से वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाना या नियमों को तोड़ना नहीं था। कांग्रेस के अनुसार, भाजपा सरकार आदिवासियों के अधिकारों की आवाज उठाने वाले नेताओं को डराने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रही है।
विस्थापन के मुद्दे पर बढ़ा सत्तापक्ष और विपक्ष का टकराव
केन-बेतवा परियोजना और जंगल की जमीन से जुड़े अधिकारों को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष अब एक बड़े राजनीतिक टकराव में तब्दील हो चुका है। भाजपा जहां इसे कानून के उल्लंघन का मामला बताकर कांग्रेस को घेर रही है, वहीं कांग्रेस इसे जनहित और आदिवासियों के हक की लड़ाई बताकर पलटवार कर रही है। पन्ना के जंगलों से शुरू हुआ यह विवाद अब भोपाल की राजनीति का केंद्र बन गया है, जिससे विकास बनाम पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।

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