75 साल में कैसे बदली बंगाल की सत्ता? कांग्रेस से भाजपा तक का पूरा राजनीतिक सफर
कोलकाता | पश्चिम बंगाल के 75 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में साल 2026 एक नए युग की शुरुआत के रूप में दर्ज हो गया है। दशकों तक कांग्रेस, वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व के बाद, राज्य की सत्ता की कमान अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में आ गई है। 2021 में नंदीग्राम की ऐतिहासिक जीत से ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले शुभेंदु अधिकारी अब भाजपा विधायक दल के नेता के रूप में इस बदलाव के सूत्रधार बने हैं। जनसंघ के कालखंड से शुरू हुआ भाजपा का सफर अंततः पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुँच गया है।
कांग्रेस के प्रभुत्व से वामपंथ के अभेद्य दुर्ग तक
आजादी के बाद 1952 के पहले चुनाव से लेकर करीब दो दशकों तक बंगाल की राजनीति में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। हालांकि, 1967 के बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर आया, जिसने 1977 में वाम मोर्चे के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वामपंथियों ने लगातार 34 वर्षों तक शासन किया, जो विश्व इतिहास में सबसे लंबे लोकतांत्रिक वामपंथी शासन के रूप में जाना जाता है। भूमि सुधार और पंचायती राज उनकी पहचान बने, लेकिन उद्योगों की तालाबंदी और राजनीतिक संघर्ष ने अंततः इस किले को कमजोर कर दिया।
परिवर्तन का दौर: सिंगूर-नंदीग्राम से तृणमूल का उदय
2007 में सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने बंगाल की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया। ममता बनर्जी इन आंदोलनों के जरिए एक शक्तिशाली जननेता के रूप में उभरीं और 2011 में 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका। 2021 के चुनाव में भाजपा की कड़ी घेराबंदी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता बचाने में सफल रही थी, लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक चुनौतियों ने धीरे-धीरे बदलाव की जमीन तैयार कर दी।
2016-2026: एक दशक में भाजपा की लंबी छलांग
भाजपा का बंगाल में उत्थान किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। 2016 में महज 3 सीटों पर सिमटी पार्टी ने 2021 में 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षक भर्ती घोटाला, संदेशखाली की घटनाएं और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे संवेदनशील मुद्दों ने जनता के बीच सत्ता विरोधी लहर को हवा दी। 2026 के विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के खिलाफ उपजा यही जन-आक्रोश भाजपा के पक्ष में एक निर्णायक जनादेश बनकर उभरा।

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