ईरान की दो-टूक: अमेरिका-इज़रायल माने तो होर्मुज स्ट्रेट फिर से खोल देंगे
ईरान और अमेरिका के बीच जारी यह तनाव वर्तमान में वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz), जो दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20-30% नियंत्रित करता है, का बंद होना एक ऐसा दांव है जिसने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है।
ईरान के डिप्टी रक्षा मंत्री रेज़ा तलाई निक का बयान इस गतिरोध को सुलझाने की दिशा में एक शर्त के रूप में आया है, लेकिन जमीनी हकीकत काफी जटिल है।
ईरान की 3 प्रमुख शर्तें और वर्तमान स्थिति
ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए जो शर्तें रखी हैं, वे मुख्य रूप से डोनाल्ड ट्रंप की 'अधिकतम दबाव' (Maximum Pressure) की नीति को चुनौती देती हैं:
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अमेरिकी नाकेबंदी (Blockade) खत्म करना: ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके बंदरगाहों और तेल निर्यात पर लगी सख्त पाबंदियों को तुरंत हटाए।
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इज़रायल की सैन्य कार्रवाई पर रोक: लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों में इज़रायल के हमलों को रोकना ईरान की एक प्रमुख कूटनीतिक शर्त है।
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परमाणु वार्ता को बाद के लिए टालना: ईरान का प्रस्ताव है कि पहले व्यापारिक रास्ते (Hormuz) और युद्ध विराम पर समझौता हो, जबकि परमाणु मुद्दों पर बातचीत बाद में की जाए।
डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी शर्तों पर अडिग हैं। उनका तर्क है कि:
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दबाव की नीति: ट्रंप का मानना है कि नाकेबंदी की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था "पतन की स्थिति" (State of Collapse) में है और यही समय है जब ईरान को बिना किसी रियायत के झुकने पर मजबूर किया जा सकता है।
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कोई रियायत नहीं: ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वे तब तक नाकेबंदी नहीं हटाएंगे जब तक ईरान बिना शर्त होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोलता और अपनी परमाणु गतिविधियों पर स्थायी रोक नहीं लगाता।
आगे की राह?
वर्तमान में पाकिस्तान और कतर जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दोनों पक्षों के बीच 'भरोसे की कमी' सबसे बड़ी बाधा है। जहाँ एक तरफ ईरान इसे अपनी संप्रभुता और "पायरेसी" (अमेरिका द्वारा टैंकरों को रोकना) के खिलाफ प्रतिरोध बता रहा है, वहीं ट्रंप इसे ईरान को पूरी तरह आत्मसमर्पण कराने के अवसर के रूप में देख रहे हैं।

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