साइबर फ्रॉड पर सख्त रुख: हाई कोर्ट ने दो आरोपियों की जमानत ठुकराई
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने वॉट्सऐप और टेलीग्राम पर बने ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट ग्रुप के जरिए कथित धोखाधड़ी के मामले में दो लोगों को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह अदालत देशभर में साइबर अपराधों और वित्तीय धोखाधड़ी में खतरनाक बढ़ोतरी को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
इनसे संबंधित थी याचिका
जस्टिस अजय दिग्पॉल ने कहा कि ऐसे अपराध भौगोलिक सीमाओं से बंधे नहीं होते। इन्हें भारत के किसी भी हिस्से से जुड़े लोगों की ओर से दूर से अंजाम दिया जा सकता है। इससे पीड़ित लोग अक्सर अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों में बिखरे हुए रह जाते हैं। कोर्ट ने यह टिप्पणी परमजीत खर्ब और राम कुमार रमन की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए 3 नवंबर के आदेश में की।
क्या था मामला
दोनों ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा 2024 में जालसाजी, आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के अपराधों के लिए दर्ज केस में जमानत की मांग की थी। एफआईआर में आईटी एक्ट के तहत अपराध के भी आरोप है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 17 जनवरी 2024 को स्पेशल सेल की IFSO यूनिट को ऐसे लोगों से कई शिकायतें मिलीं, जिनसे कथित तौर पर ₹CHCSES₹ नाम से संचालित वॉट्सऐप और टेलीग्राम पर बनाए गए ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट ग्रुप के जरिए धोखाधड़ी की गई थी।
रुपए ट्रांसफर करवाने के बाद किया ब्लॉक
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि उन्हें फर्जी एप्लिकेशन और वेबसाइटों के जरिए ऑनलाइन ट्रेडिंग में निवेश करने के लिए उकसाया गया और बड़ी रकम ट्रांसफर होने के बाद आरोपियों ने उनसे कॉन्टैक्ट खत्म कर लिया। उनके फोन का जवाब देना बंद कर दिया और उनकी एक्सेस ब्लॉक कर दी।
थोड़ी ज्यादा सावधानी की जरूरत
मामले में आरोपों की गंभीरता, संगठित तरीके जिससे अपराध को अंजाम दिया गया और व्यापक साजिश की चल रही जांच को देखते हुए हाई कोर्ट को इस समय इन दोनों को जमानत देना सही नहीं लगा। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले के जैसे आरोपों के लिए थोड़ा ज्यादा न्यायिक सावधानी की जरूरत है, क्योंकि जमानत के स्तर पर नरमी बरतने से उन अपराधों में रोकथाम की क्षमता कम हो सकती है। जो सीमा-पार और तकनीकी रूप से जटिल हैं। हाई कोर्ट को पहली नजर में कथित अपराध में दोनों आरोपियों की सक्रिय भूमिका नजर आई।

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