प्राकृतिक खेती अपनाने वाले रतलाम जिले के ग्राम धामनोद निवासी किसान चंद्रभानू चौधरी ने बताया कि पहले उन्होंने कुछ समय तक रसायन आधारित खेती की,
रतलाम
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले रतलाम जिले के ग्राम धामनोद निवासी किसान चंद्रभानू चौधरी ने बताया कि पहले उन्होंने कुछ समय तक रसायन आधारित खेती की,
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले रतलाम जिले के ग्राम धामनोद निवासी किसान चंद्रभानू चौधरी ने बताया कि पहले उन्होंने कुछ समय तक रसायन आधारित खेती की, लेकिन इससे कीट-पतंगों एवं रोगो की समस्या बढ़ी, फसलें खराब होने लगीं और लगातार केमिकल डालने के बावजूद भी सुधार नहीं हो पा रहा था। इससे उत्पादन घटने के साथ-साथ लागत लगातार बढ़ती चली गई। थक-हार कर उन्होंने पुनः अपनी पारंपरिक प्राकृतिक खेती को अपनाया। इस दौरान कृषि विभाग एवं आत्मा विभाग से उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन मिला। विभागीय अधिकारियों द्वारा खेत पर आकर नियमित निरीक्षण और परामर्श दिया गया, जिससे प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक तरीके से अपनाने में मदद मिली।
किसान चंद्रभानू चौधरी ने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से केमिकल एवं फर्टिलाइजर पर होने वाला पूरा खर्च बच गया। पहले सभी खर्च काटने के बाद लगभग 5 लाख रुपए वार्षिक बचत होती थी, जबकि अब लगभग 15 से 20 लाख रुपए तक वार्षिक शुद्ध लाभ हो रहा है। उन्होने बताया कि हर रविवार को वे कस्तुरबा नगर रतलाम में स्वयं की दुकान अंबिका प्राकृतिक उत्पाद पर प्राकृतिक सब्जियां एवं फल लोगो को उपलब्ध कराते है। जिसका पूरा लाभ उन्हें ही प्राप्त होता है। मजदूरी खर्च निकालने के बाद भी करीब 15 लाख रुपए की बचत होती है। उन्होंने कहा कि यह खेती न केवल आर्थिक रूप से लाभदायक है, बल्कि इससे शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं।
उन्होंने बताया कि वे जीवामृत, घनजीवामृत, दशपर्णी अर्क, वर्मी कम्पोस्ट स्वयं तैयार करते हैं, जिनमें गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन एवं आसानी से उपलब्ध पौधो की पत्तियों का उपयोग किया जाता है। साथ ही वैज्ञानिक पद्धति से ड्रिप इरीगेशन एवं फव्वारा पद्धति अपनाकर पानी की भी बचत की जिससे कम पानी मे भी ज्यादा फसलों का उत्पादन कर पाते है। यदि अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती को अपनाएं, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि सभी का स्वास्थ्य और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।
जिला संवाददाता लाखनसिंह सिसोदिया स्पेशल रिपोर्ट



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