भारतीय सनातन संस्कृति में प्रत्येक सनातनी हिन्दू पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं जिन्हें देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण कहा जाता हैं। 


              ईश्वर ने हमें मानव जन्म प्रदान किया इसलिए हम देवताओ के ऋणी है, इसी प्रकार हमारे दिव्य ऋषि मुनियों ने कठिन तपस्या से इस सनातन संस्कृति व परंपराओं का निर्माण किया अतः हम उनके ऋणी हैं तथा हमारे पूर्वजों ने हमे जन्म दिया और हमारा पालन पोषण किया अतः हम उनके भी ऋणी हैं, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को देवताओं, ऋषियों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए ।
        आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के ये 16 दिन हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय है। ज्योतिष, हस्तरेखा एवं वास्तु आचार्य पं. पराग जोशी ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र में अमावस्या तिथि के देवता पितृ माने गए हैं, अतः जिन जातकों की जन्म कुंडली में पितृ दोष व कालसर्प दोष है उन्हे सर्व पितृ अमावस्या पर पितृओ के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंड दान और अन्न दान अवश्य करना चाहिए ।

पारस्कर गृह्य सूत्र के अनुसार-

"जलेचरा भूनिलया वाय्वा धाराश्च जन्तवः।  
तृप्तिमेते प्रयांत्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:।।

तर्पण के माध्यम से केवल हमारे पितृओं को ही नहीं अपितु हमारी संपूर्ण प्रकृति ( वृक्ष, नदियां, सागर, पर्वत, जल में रहने वाले जीव, स्थल पर रहने वाले जीव, आकाश में विचरण करने वाले जीव ) सहित समस्त चराचर जगत को जलांजलि प्राप्त होती हैं। साथ ही पूर्व जन्म के सम्बधियों व जिनके कुल में कोई श्राद्ध करने वाला नहीं हो उन्हें भी जलांजलि प्राप्त हो जाती है।
           इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 21 सितंबर रविवार को प्राप्त हो रही हैं । आइए हम सभी इस सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध के माध्यम से हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करें।