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तन-मन:परिश्रम करने वाला बीमार नहीं होता, परिश्रम ही है अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी

  • मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि…अगर आप उड़ नहीं सकते तो दौड़ें, दौड़ नहीं सकते तो चलें, अगर चल भी नहीं सकते तो रेंगते हुए चलें…लेकिन हमेशा आगे बढ़ते रहें।
  • यह बात भले उन्होंने भले ही किसी भी संदर्भ में कही हो पर निरंतर सक्रिय रहना और यथाशक्ति परिश्रम करते रहना…
  • यही एक सूत्र है स्वस्थ रहने का…
  • मैं जब एमबीबीएस कर रहा था तो मेरी किताबें कहती थीं कि घी खाने से दिल की बीमारी की आशंका बढ़ती है जबकि तेल (पॉली अनसैचुरेटेड फ़ैटी एसिड्स) खाने से दिल की बीमारियों से बचाव होता है। लेकिन जब मैं गांव जाता तो किताबों की इस बात से मेरा विश्वास डगमगाने लगता। गांव में ख़ूब गायें थीं और ख़ूब घी होता था। सब्ज़ी बनाने में तो उसका उपयोग होता ही, घी से चूरमा भी ख़ूब बनता। दिन भर में अनेक बुज़ुर्ग भी काफ़ी घी खा लेते पर दिल की बीमारी के लक्षण या उससे मरते किसी को नहीं देखा। विज्ञान कभी ज़िद नहीं करता। जाने-अनजाने में हुई भूल या अपने अज्ञान का पता लगते ही वह स्वयं को संशोधित करता है। बाद में चिकित्सा विज्ञान ने यह स्वीकार किया कि गाय के घी में ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड्स होते हैं, जो दिल की बीमारियों से सुरक्षा देते हैं। यह ओमेगा-3 दिल की बीमारियों से सुरक्षा का कारण तो हो सकता है लेकिन उन्हें इतना घी खाने के बाद भी मोटापे से सुरक्षा कौन दे रहा था? क्योंकि मोटापा स्वयं सैकड़ों बीमारियों का जनक है। उनके पास स्मार्ट वॉच नहीं होती। वे कोई स्टेप्स काउंट नहीं करते। कैलोरी-बर्न का हिसाब-किताब नहीं रखते। लेकिन वे वृद्ध लोग भी अक्सर दो-चार कोस दूर खेत का चक्कर लगा आते। गाय, बकरी, ऊंट, घोड़े को कुओं से पानी पिला आते। उन्हें जंगल तक हांकने जाते। नहाने के लिए भी एकाध कोस दूर कुओं तक जाते। कुएं से ज़रूरत जितना पानी भी सींच लेते। यानी एक जगह बैठे रहने के बजाय दिन भर कुछ न कुछ करते रहते। इन कार्यों से उनकी इतनी ऊर्जा उपयोग में आती कि उनके खाए घी में शेष कुछ नहीं बचता। शरीर के बहीखाते में भी सारा मामला आय-व्यय का है। बैलेंस परफ़ेक्ट होने की वजह से इन्हें कभी मोटापे की समस्या नहीं हुई।
  • मेहनत या व्यायाम करने से क्या होता है?
    1. मोटापा (ओबेसिटी) कम होता है : मोटापा हमारे शरीर में होने वाली बहुत सी बीमारियों का जनक है। जैसे – ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) : यह सांस की बीमारी है, जिसमें व्यक्ति रात में ज़ोर से खर्राटे लेता है लेकिन सांस लेने में रुकावट होने से नींद पूरी नहीं होती। उस कारण दिन में भी उनींदा ही रहता है। हर समय आलस। स्मरण शक्ति का ह्वास होने लगता है। एकाग्रचित्त नहीं हो पाता।

    ओबेसिटी हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम : जिसमें शरीर में एसिड-बेस के संतुलन में बाधा होने लगती है। हाइपरटेंशन, इस्कमिक हार्ट डिजीज (IHD), कार्डियक एरिद्मिया, हायटस हर्निया, गेस्ट्रो-इसोफ़ेज़ियल रिफ्लक्स डिज़ीज़, डायबिटीज़, थ्रोम्बो-एम्बोलिक डिज़ीज़, दवाइयों का मेटाबोलिज़्म। वहीं, अचानक मृत्यु होना आदि, जिसका कारण ज्ञात नहीं होता, ऐसे मामले भी सामान्य लोगों से 13 गुना ज़्यादा होते हैं।

    2. हृदय रोगों से बचाव : व्यायाम हमारे भीतर जमा वसा में हाई डेंसिटी लाइपोप्रोटीन्स (HDL) यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है और इससे बुरे कोलेस्ट्रॉल यानी ट्राईग्लिसराइड्स घटते हैं। इससे हमें हृदय रोगों से सुरक्षा मिलती है। हमें उच्च रक्तचाप से भी बचाते हैं।
    3. निम्नलिखित रोगों की आशंका भी कम हो जाती है : स्ट्रोक, मेटाबोलिक सिंड्रोम, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज़, अवसाद, एंग्ज़ायटी, विभिन्न प्रकार के कैंसर, जोड़ों का दर्द (आर्थराइटिस)

    रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ती है : यह अनेक वैज्ञानिक शोध में साबित हो चुका है। अभी कोरोना संक्रमण में भी हमारे गांव काफ़ी बचे हुए हैं। दूर-दूर बसे घर और खुली हवा तो बचाव का कारण है ही, लेकिन धूप में परिश्रम के कारण उनकी इम्युनिटी भी इस बचाव में सहायक है।

    5 तनाव कम करना : व्यायाम व अन्य शारीरिक गतिविधियां हमारे ब्रेन में इस तरह के रसायनों का स्राव बढ़ाती हैं, जिससे हमारा मूड अच्छा होता है, हमारे भीतर उत्साह और उमंग जाग्रत होती है। हम तनाव मुक्त (रिलैक्स) महसूस करते है। एंग्ज़ायटी कम होती है।

    6. शरीर की हरेक कोशिका तक रक्त ऑक्सीजन और भोजन तत्वों (न्यूट्रीएंट्स) की आपूर्ति बढ़ जाती है, इसलिए वे भी हरी-भरी होकर लहलहाने लगती हैं। हमारी मांसपेशियां मज़बूत होने लगती हैं। हृदय और फेफड़े भी पहले से बेहतर काम करने लगते है। हमारी ऊर्जा बढ़ जाती है। जीवन के प्रति रवैया बदल जाता है।

    7 अनेक लोगों के लिए नींद लेना भी किसी युद्ध से कम नहीं होता। व्यायाम न केवल उत्साह बढ़ाने वाले रसायनों का स्राव करता है बल्कि ब्रेन में ऐसे रसायनों का स्राव भी करता है जिनसे बिस्तर पर जाते ही गहरी और अच्छी नींद आए।

    8 इससे हम मानसिक और शारीरिक रूप से बेहतर दिखने लगते हैं। हमारा स्वयं पर विश्वास (सेल्फ कॉन्फ़िडेंस) बढ़ता है।

    कितना व्यायाम किया जाए और डाइट में क्या लिया जाए

    — सप्ताह में 150 मिनट का व्यायाम काफ़ी है। लेकिन ऐसा न हो कि दो दिन 75 मिनट कर लिया, शेष दिनों में छुट्टी। हर रोज़ करें। इतना ही नहीं प्रयास करें कि हर घंटे आप कुछ करते रहें। तेज़ चलना, दौड़ना, तैरना कुछ भी। अगर आप ख़ास क़िस्म के व्यायाम करना चाहते हैं तो उचित होगा कि प्रशिक्षक की देखरेख में करें।

    — बाज़ार में आजकल इतने सारे डिवाइस मौजूद हैं कि हमारी एंग्ज़ायटी बढ़ गई है। हाय राम! आज तो तीन सौ स्टेप कम हुए। आज थोड़े ज़्यादा हो गए। आज मल्टीविटामिन नहीं ले पाया। आज लौकी का जूस नहीं मिला। ऐसी अनेक चिंताएं मत कीजिए। बहुत ज़्यादा गणित मत बिठाइए। कोई भी चिकित्सक, योग शिक्षक, डायटीशियन नहीं कह सकता कि ऐसा करने से ऐसा होगा या ऐसा नहीं होगा। प्रकृति ने हमें पूर्ण आहार दिया है। आपके यहां यथासंभव जो उपलब्ध है, उसे उपयोग में लीजिए। सब्ज़ियां, दालें, दूध, दही, छाछ, गाय का घी, गेहूं, दाल, चावल, फल जो भी है, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सब मिलते रहें और नियमित मिलते रहें, यह ध्यान रखें। बाज़ार में दुनिया भर की सब्ज़ियां और फल उपलब्ध हैं। जो सक्षम हैं वे उपयोग में लें अन्यथा स्थानीय प्रकृति की देन से भी हमारा काम चल जाएगा।

    — पर्याप्त मात्रा में पानी पीना = शरीर में इलेक्ट्रोलाइट के बैलेंस और वेस्ट मैटर के विसर्जन के लिए आवश्यक है। समय पर नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात्रि का भोजन करें। ज़रूरत लगे तो बीच में भी ले सकते हैं। मारवाड़ी में कहते हैं, ‘मूर्ख खाए मरे या ऊंचाए मरे’ (मूर्ख ज़्यादा खाकर मरता है या ज़्यादा वजन उठाकर मरता है), ऐसा नहीं करें।

    दिनचर्या व स्वयं में थोड़ा बदलाव
    अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन का कहना है कि-
    1950 से अभी तक देखा जाए तो अधिक देर तक बैठे रहने वाले यानी हमारे शरीर को निष्क्रिय करने वाले जॉब 83% बढ़ गए हैं।
    हमारे यहां भी उसी तरह के जॉब्स बढ़ते जा रहे हैं, यह चिंता का विषय है।
    2015 में जॉन होप्किंस यूनिवर्सिटी के…कार्डियोलॉजिस्ट और एसोसिएट डायरेक्टर ऑफ़ प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी डॉ. एरिन माइकोज़ ने एनल्स ऑफ़ इंटरनल मेडिसिन में एक शोध प्रकाशित की।
    इसमें वे बताते है कि – नियमित व्यायाम के बावजूद लम्बे समय तक बैठकर काम करने वाले लोगों में दिल की बीमारियां, डायबिटीज़, कैंसर की दर तो अधिक होती ही है, उनमें दिल या अन्यान्य बीमारियों के कारण अचानक मृत्यु दर भी अधिक होती है।
    वे कहते हैं अगर…आप आधा घंटा कठिन व्यायाम करते हैं या पांच-सात किलोमीटर दौड़ते हैं, तब भी शेष 23 घंटे क्या करते हैं, यह महत्वपूर्ण है। कसरत के बाद अगर आप दस घंटे लगातार कंप्यूटर पर बैठते हैं तो यह भी अस्वस्थ तरीक़ा है।
    अगर ऐसा ज़रूरी है तब भी…
    आप छोटे-छोटे बदलाव कीजिए जैसे लिफ्ट की सुविधा है तब भी सीढ़ियों से जाएं। पानी की ज़रूरत होने पर मंगाने के बजाय स्वयं पीकर आएं। चाय कॉफ़ी सीट पर मंगाने के बजाय कैंटीन तक चलकर जाएं। सहकर्मी से काम होने पर उसे मैसेज या कॉल करने के बजाय उठकर उसकी सीट तक जाएं।
    आदर्श स्थिति तो यह है कि – 20 मिनट बैठने के बाद 8 मिनट खड़े रहें और 2 मिनट आसपास वॉक करें।
    प्रयास करें कि रोज़ के कम से कम दस हजा़र स्टेप्स हों।

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